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इंसान बनो : कविता

Posted On: 11 Aug, 2015 Others,कविता में

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अपनी बेरंग और नीरस
हो चुकी जिंदगी में
मैं कुछ चमत्कार की
उम्मीद में था
अनेक शिवालयों में
सैकड़ो देवालयों में
फाकों के समय में
सामर्थ्य से जयादा
हजारों का चढ़ावा
दान देकर भी
रंग और उल्लास
नहीं खरीद पाया

मगर एक दिन
छोटी सी
एक बच्ची को
ट्रेफिक सिग्नल पर
भीख मांगते देख कर
कुछ भोजन
करा दिया था
उसी दिन शाम तक
उदासी को ढूंढता रहा
तब समझ आया
की जीवन की
खुशियाँ
मंदिर मस्जिद, गुरुद्वारों
में भटकती भी नहीं
ये तो बस
दर्द बाँटने में
मदद करने में
बिन ढूंढें
मन में घर कर आती हैं!

उल्लास तो मन में
बसता है
तो फिर….
बस जाता है
इंसानियत का नशा
चढ़ता है
तो फिर…..
चढ़ जाता है!

बेतरतीब जिंदगी
खुद के लिए जीना
खुद के लिए मरना
जो मरते हुए भी
काम न आएगी कभी
उस दौलत के लिए मरना
बिन ख़ुशी के इतनी दौलत
कहाँ ले जाएगी तुम्हे
अवसाद में लपेटकर
एकांत में ले जाएगी तुम्हे
तमगा लगा देगी ये
तुम पर
इन्सान न होने का
इंसानियत से दूर
ले जाएगी तुम्हे.

तो फिर उठो, जागो!
इंसान बनो
मानवता की
पहचान बनो
तुम्हारे स्वयं
के अन्दर
एक भगवान्
है छुपा बैठा
लोगों की मदद करो..
और भगवान् बनो!
……………………………………..©पुनीत शर्मा!
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