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झूठी शान से बच जाती

Posted On: 24 May, 2015 Others,social issues,कविता में

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गोद में लेकर मुझे
हे पिता! तुमने कहा था
मांग ले गुडिया तुझे
जो खिलौना मांगना है
**********************
हाथ जिस पर रख दिया
तुम्हे कब ना पसंद था
उसका क्या मोल है
उठा कभी यह प्रश्न था?
**********************
जिन सपनो के संग खेली
भेदभाव था नहीं उनमे कभी
जीवनपथ में स्वयं चुनाव हो
एसा सन्देश था जिनमे कभी
**********************
माँ भी मुझे प्यार करती
पर कभी वह डांट लेती
किन्तु पिता तुमसे मिला
अनवरत अक्षीण प्रेम प्रकाश
**********************
संवेदना माँ से अधिक
मैंने तुम्हारी पाई थी
छत्र छाया में तुम्हारी
मैं निडर जीती आई थी
**********************
वक्त जैसे स्वतंत्र पंछी
की तरह उड़ता गया
आँगन में तुम्हारे एक चाँद
पूर्णिमा को बढता गया
**********************
फिर एक दिन क्यों
सब कुछ बदल गया
मेरा किसी से प्रेम आपको
क्यों और कैसे अखर गया
**********************
कैसे समाज की रूडीवादिता
तुम पर हावी हो गई..
क्यों तुम्हारी गुडिया से तुम्हे
घनघोर नफरत हो गई?
**********************
क्या प्रेम करना था मेरा गुनाह
या स्वयं चुनाव से हुए तुम शर्मिंदा?
क्यों खांप नियमो के मोहताज हुए तुम
कैसे तुम मेरे गले पर चला पाए रंदा?
**********************
मुझे ससुराल भेज दोगे
सोच कर रोने वाले, हे पिता!
अपनी शान की खातिर
कैसे मुझे तुम मार पाए?
**********************
मुझे अपना भाग्य
बताने वाले हे पिता!
मेरे भाग्य में कैसे
तुम मौत लिख पाए?
**********************
तुमने ही बतलाया था
प्रेम करना ही धर्म है
तुमने ही सिखलाया था
नफरत सबसे बड़ा कुकर्म है
**********************
मनुजो के काम न आये
धर्म नहीं आडम्बर है
मनुज मनुज को प्रेम करे
यही धर्म का सन्दर्भ है
**********************
तुमने मेरा खून नहीं
अपना खून किया है
मानवता शर्मशार हुई है
तुमने बड़ा अधर्म किया है
**********************
हे पिता! मैं जा रही हूँ
इन अधूरे सवालों साथ
फिर कभी न लौटकर
आने के वादे के साथ.
**********************
मनुष्य बनने से अच्छा
मैं पशु ही बन जाती
कोई पिता नहीं देता
किसी खांप को मेरी आहुति
मैं झूठी शान से बच जाती
मैं झूठी शान से बच जाती!
My Blog Address:- advpuneet.jagranjunction.com/

Web Title : JHOOTHI SHAN SE BACH JATI

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ravi Raj के द्वारा
May 24, 2015

बहुत अच्छी कविता है…शुभकामनाएं!

jlsingh के द्वारा
May 27, 2015

मनुजो के काम न आये धर्म नहीं आडम्बर है मनुज मनुज को प्रेम करे यही धर्म का सन्दर्भ है बेहतरीन सन्देश के साथ मर्माहत करती हुई कविता

advpuneet के द्वारा
May 27, 2015

अपना बहुमूल्य समय कविता पर देकर उत्साह बढ़ने के लिए बहुत बहुत आभार सर जी! धन्यवाद.


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