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हे कवि! तुम धन्य!

Posted On: 22 May, 2015 Others,कविता में

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सपनो के संसार में जीना,
शब्दों से खिलवाड़ मचाना
नदिया को दुल्हन सा सजाना
पर्वत को प्रहरी बतलाना
राई को पहाड़ बनाना
सुप्त शिराओ में उल्लास जगाना
व्याकुल मन में प्रेम जगाना
और कभी समाज को दिशा दिखाना
वीरों के मन हो ओज मुखर
ऐसा ओजस्वी संगीत बजाना
जीवन पथ पर कर्त्तव्य अनेक
तुम अपने कर्म करते जाना
हे कवि! तुम धन्य!
धन्य तुम्हारी साधना!
राष्ट्र चेतना का अलख
तुम प्रतिपल जगाते जाना!

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ravindra K Kapoor के द्वारा
May 22, 2015

अच्छी सुन्दर रचना है पर सपनों के संसार में रहना कुछ कवि की विवशता है. शायद इसलिए कि वास्तविक संसार बहुत सी बद्सूर्तियों से भी भरा है और पढ़ने वाला कुछ देर के लिए सुंदरता का बोध करते रहना चाहता है. सुभकामनाएँ ….Ravindra K Kapoor

advpuneet के द्वारा
May 22, 2015

अपना बहुमूल्य समय कविता पर देने और प्रतिकिर्या देने के लिए रविन्द्र जी बहुत बहुत आभार. आपकी प्रतिकिर्या से सहमत हूँ. और मेरा मानना है कि सपनो के संसार में रहने के साथ साथ कवि यथार्थ के भी लगभग करीब होते है. और अपने सपनो के संसार में रहकर ही अनेक रंग देख भी लेते हैं और उनका चित्रांकन भी कर देते हैं…एक बार फिर से आपका बहुत बहुत आभार !


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